S Jaishankar Quotes

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मनुष्य, दूसरों को अपने मार्ग पर चलाने के लिए रुक जाता है, और अपना चलना बन्द कर देता है।
जयशंकर प्रसाद (चन्द्रगुप्त)
किरणों की चोट से कोयल कुहुक उठी। आम की कैरियों के गुच्छे हिलने लगे। उस आम की बारी में माधव- ऋतु का डेरा था और श्यामा के कमनीय कलेवर में यौवन
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
इस अनन्त ज्वालामयी सृष्टि के कर्त्ता! क्या तुम्हीं करुणा-निधान हो? क्या इसी डर से तुम्हारा अस्तित्व माना जाता है? अभाव, आशा, असन्तोष और आर्त्तनादों के आचार्य! क्या तुम्हीं दीनानाथ हो? तुम्हीं ने वेदना का विषम जाल फैलाया है? तुम्हीं ने निष्ठुर दुःखों को सहने के लिए मानव हृदय-सा कोमल पदार्थ चुना है और उसे विचारने के लिए, स्मरण करने के लिए दिया है अनुभवशील मस्तिष्क? कैसी कठोर कल्पना है, निष्ठुर! तुम्हारी कठोर करुणा की जय हो!
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
अमीरी की बाढ़ में न जाने कितनी वस्तु कहाँ से आकर एकत्र हो जाती हैं बहुतों के पास उस बाढ़ के घट जाने पर केवल कुर्सी कोच और टूटे गहने रह जाते हैं,
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मृणालिनी को देखते ही उसके विचार रूपी मोतियों को प्रेम-हंस ने चूग लिया और उसे उसकी बुद्धि और भी भ्रमपूर्ण जान पड़ने लगी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
वह नव-कुसुमित पददलित आश्रय-विहीन माधवी-लता के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
प्रेम महान् है, प्रेम उदार है। प्रेमियों को भी वह उदार और महान् बनाता है। प्रेम का मुख्य अर्थ है ‘आत्मत्याग’।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
निद्रा भी कैसी प्यारी वस्तु है। घोर दु:ख के समय भी मनुष्य को यही सुख देती है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
जिस तरह वीणा की झंकार से मस्त होकर मृग स्थिर हो जाता है अथवा मनोहर वंशी की तान से झूमने लगता है वैसे ही मृणालिनी के मधुर स्वर में मुग्ध मदन ने कह दिया
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
उस दीन भिखारी की तरह, जो एक मुट्‌ठी भीख के बदले अपना समस्त संचित आशीर्वाद दे देना चाहता है,
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
बलिष्ठ और दृढ़ था। चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं। वर्षा की झड़ी में, पूस की रातों की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानता था। उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखनेवालों की आँखों में चुभती थीं। उसका साँवला रंग, साँप की तरह चिकना और चमकीला था। उसकी नागपुरी धोती का लाल रेशमी किनारा दूर से ही ध्यान आकर्षित करता। कमर में बनारसी सेल्हे का फेंटा, जिसमें सीप की मूठ का बिछुआ खुँसा रहता था। उसके घुँघराले बालों पर सुनहले पल्ले के साफे का छोर उसकी चौड़ी पीठ पर फैला रहता। ऊँचे कन्धे पर टिका हुआ चौड़ी धार का गँडासा, यह थी उसकी धज! पंजों के बल जब वह चलता, तो नसें चटाचट बोलती थीं। वह गुण्डा था।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
हाथ में हरौती की पतली-सी छड़ी, आँखों में सुरमा, मुँह में पान, मेंहदी लगी हुई लाल दाढ़ी, जिसकी सफेद जड़ दिखलाई पड़ रही थी, कुव्वेदार टोपी, छकलिया अँगरखा और साथ में लैसदार परतवाले दो सिपाही! कोई मौलवी साहब हैं।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
वर्षा की रात में झिल्लियों का स्वर उस झुरमुट में गूँज रहा
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
बेला में यह उच्छृंखल भावना विकट ताण्डव करने लगी। उसके हृदय में वसन्त का विकास था। उमंग में मलयानिल की गति थी। कण्ठ में वनस्थली की काकली थी। आँखों में कुसुमोत्सव था और प्रत्येक आन्दोलन में परिमल का उद्‌गार था। उसकी मादकता बरसाती नदी की तरह वेगवती थी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
पिंजड़े की वन-विहंगनी को वसन्त की फूली हुई डाली का स्मरण हो आया था।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
सावधान हो गये थे। उनका
जयशंकर प्रसाद (इंद्रजाल)
चढती
जयशंकर प्रसाद (कामायनी)
वे अब समझते थे—जगत् तो मिथ्या है ही, इसके जितने कर्म हैं, वे भी माया हैं। प्रमाता जीव भी प्रकृति है, क्योंकि वह भी अपरा प्रकृति है। जब विश्व मात्र प्राकृत है, तब इसमें अलौकिक अध्यात्म कहाँ। यही खेल यदि जगत् बनाने वाले का है, तो वह मुझे खेलना चाहिए।
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
पसे मर्ग मेरी मजार पर जो दिया किसी ने जला दिया। उसे आह! दामने बाद ने सरेशाम ही से बुझा दिया! इ
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
सोमदेव ने धीरे से कहा—वेश्या है, सरकार। मिरजा ने कहा—दरिद्र हैं। स
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
यौवन के व्यंजन दिखायी देने से क्या हुआ, अब भी उसका मन दूध का धोया है। उसे लड़की कहना ही अधिक संगत होगा।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
पशुओं को खाते-खाते मनुष्य, पशुओं के भोजन को जगह भी खाने लगे। ओह! कितना इनका पेट बढ़ गया
जयशंकर प्रसाद (तितली)
कितने ही सिरिस, महुआ, नीम और जामुन के वृक्ष थे—जिन पर घुमची, सतावर और करञ्ज इत्यादि की लतरें झूल रही थीं। नीचे की भूमि में भटेस के चौड़े-चौड़े पत्तों की हरियाली थी। बीच-बीच में बनबेर ने भी अपनी कँटीली डालों को इन्हीं सबों से उलझा लिया था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
सारे अंग को इस तीखी चितवन से देखा, जैसे कोई सौदागर किसी जानवर को खरीदने से पहले उसे देखता हो।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
इन्हें चक्रवाक कहते हैं। इनके जोड़े दिन-भर तो साथ-साथ घूमते रहते हैं, किन्तु संध्या जब होती है, तभी ये अलग हो जाते हैं। फिर ये रात-भर नहीं मिलने पाते।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
अभावमयी धारा को देख रही थी और उसका समय भी वैसा ही ढल रहा था; जैसा गोधूलि से मलिन दिन।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
गृहस्थ नारी की मंगलमयी कृति का भक्त हूँ। वह इस साधारण संन्यास से भी दुष्कर और दम्भ-विहीन उपासना
जयशंकर प्रसाद (तितली)
स्त्रियों को उनकी आर्थिक पराधीनता के कारण जब हम स्नेह करने के लिए बाध्य करते हैं, तब उनके मन में विद्रोह की सृष्टि भी स्वाभाविक है! आज प्रत्यके कुटुम्ब उनके इस स्नेह और विद्रोह के द्वन्द्व से जर्जर है और असंगठित है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
हमारा सम्मिलित कुटुम्ब उनकी इस आर्थिक पराधीनता की अनिवार्य असफलता है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
अन्नों को पका देने वाला पश्चिमी पवन सर्राटे से चल रहा था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
रसीली चाँदनी की आर्द्रता से मंथर पवन अपनी लहरों से राजकुमारी के शरीर में रोमाञ्च उत्पन्न करने लगा था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
आशा
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
आवश्यकता से पीड़ित प्राणी कितनी ही नारकीय यंत्रणाएँ सहता हे। उसकी सव चीजों का सौदा मोल-तोल कर लेने में किसी को रुकावट नहीं।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
सुन्दर मुख पर तृप्ति से भरी हुई निराशा थी। तृप्ति इस-लिए कि उसका कोई उपाय न था, और निराशा तो थी ही। उसका भविष्य अंधकारपूर्ण था। संतान कोई नहीं। पति निश्चिन्त भाग्यवादी कुलीन निर्धन, जिसके मस्तिष्क में भूतकाल की विभव-लीला स्वप्न-चित्र बनाती रहती
जयशंकर प्रसाद (तितली)
स्त्रियों को उनकी आर्थिक पराधीनता के कारण जब हम स्नेह करने के लिए बाध्य करते हैं, तब उनके मन में विद्रोह की सृष्टि भी स्वाभाविक है! आज प्रत्यके कुटुम्ब उनके इस स्नेह और विद्रोह के द्वन्द्व से जर्जर है
जयशंकर प्रसाद (तितली)
विजय ने मंगल से कहा—यही तो इस पुण्य धर्म का दृश्य है! क्यों मंगल! क्या और भी किसी देश में इसी प्रकार का धर्म-संचय होता है? जिन्हें आवश्यकता नहीं, उनको बिठाकर आदर से भोजन कराया जाय, केवल इस आशा से कि परलोक में वे पुण्य-संचय का प्रमाण-पत्र देंगे, साक्षी देंगे, और इन्हें, जिन्हें पेट ने सता रखा है, जिनको भूख ने अधमरा बना दिया है, जिनकी आवश्यकता नंगी होकर बीभत्स नृत्य कर रही है, वे मनुष्य, कुत्तों के साथ जूठी पत्तलों के लिए लड़ें, यही तो तुम्हारे धर्म का उदाहरण है!
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
जंगली पवन वस्त्रों से उलझता था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
सहनशील होना अच्छी बात है। परन्तु अन्याय का विरोध करना उससे भी उत्तम है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
फागुन की हवा मन में नई उमंग बढ़ाने वाली थी, सुख-स्पर्श थी।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
पीली-पीली धूप, तीसी और सरसों के फूलों पर पड़ रही थी। वसन्त की व्यापक कला से प्रकृति सजीव हो उठी थी।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
राग-विरागपूर्ण जन-कोलाहल में दिन और रात की सन्धि, अपना दुःख-सुख मिलाकर एक तृप्ति-भरी उलझन से संसार को आन्दोलित कर रही है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
जीवन का सत्य है, प्रसन्नता। वह प्रसन्नता और आनन्द की लहरों में निमग्न
जयशंकर प्रसाद (तितली)
फूलों की गन्ध उस वातावरण में उत्तेजना-भरी मादकता ढाल रही थी।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
ठीक गाँव के समीप रेलवे-लाइन के तार को पकड़े हुए उस बालक-सी थी, जिसके सामने से डाक-गाड़ी भक्-भक् करती हुई निकल जाती हैं—सैकड़ों सिर खिड़कियों से निकले रहते हैं, पर पहचान में एक भी नहीं आते, न तो उनकी आकृति या वर्णरेखाओं का ही कुछ पता चलता है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
सायंकाल था। खेतों की हरियाली पर कहीं-कहीं डूबती हुई किरणों की छाया अभी पड़ रही थी। प्रकाश डूब रहा था। प्रशान्त गंगा का कछार शून्य हृदय खोले पड़ा था। करारे पर सरसों के खेत में बसन्ती चादर बिछी थी। नीचे शीतल बालू में कराकुल चिड़ियों का एक झुण्ड मौन होकर बैठा था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
आप व्यावहारिक समता खोजते हैं; किन्तु उसकी आधार-शिला तो जनता की सुख-समृद्धि ही है न? जनता को अर्थ-प्रेम की शिक्षा देकर उसे पशु बनाने की चेष्टा अनर्थ करेगी। उसमें ईश्वर-भाव का आत्मा का निवास न होगा तो सब लोग उस दया, सहानुभूति और प्रेम के उद्‌गम से अपरिचित हो जायेंगे जिससे आपका व्यवहार टिकाऊ होगा। प्रकृति में विषमता तो स्पष्ट है। नियन्त्रण के द्वारा उसमें व्यावहारिक समता का विकास न होगा। भारतीय आत्मवाद की मानसिक समता ही उसे स्थायी बना सकेगी। यान्त्रिक सभ्यता पुरानी होते ही ढीली होकर बेकार हो जायगी।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
आप व्यावहारिक समता खोजते हैं; किन्तु उसकी आधार-शिला तो जनता की सुख-समृद्धि ही है न? जनता को अर्थ-प्रेम की शिक्षा देकर उसे पशु बनाने की चेष्टा अनर्थ करेगी। उसमें ईश्वर-भाव का आत्मा का निवास न होगा तो सब लोग उस दया, सहानुभूति और प्रेम के उद्‌गम से अपरिचित हो जायेंगे जिससे आपका व्यवहार टिकाऊ होगा। प्रकृति में विषमता तो स्पष्ट है। नियन्त्रण के द्वारा उसमें व्यावहारिक समता का विकास न होगा। भारतीय आत्मवाद की मानसिक समता ही उसे स्थायी बना सकेगी। यान्त्रिक सभ्यता पुरानी होते ही ढीली होकर बेकार हो जायगी। उसमें प्राण बनाये रखने के लिए व्यावहारिक समता के ढाँचे या शरीर में, भारतीय आत्मिक साम्य की आवश्यकता कब मानव-समाज समझ लेगा, यही विचारने की बात है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
मनुष्य पर मानसिक नियन्त्रण उसकी विचार-धारा को एक सँकरे पथ से ले चलता है—वह जीवन के मुक्त विकास से परिचित नहीं होता?
जयशंकर प्रसाद (तितली)
इस गुरुडम में कोई कल्याण की बात समझ में नहीं आती। मनुष्य को अपने व्यक्तित्व में पूर्ण विकास करने की क्षमता होनी चाहिए।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
प्राणी का प्राणी से जीवन—भर के सम्वन्ध में बँध जाना दासता समझती हूँ; उसमें आगे चलकर दोनों के मन में मालिक वनने की विद्रोह-भावना छिपी रहती है। विवाहित जीवनों में, अधिकार जमाने का प्रयत्न करते हुए स्त्री-पुरुष दोनों ही देखे जाते हैं।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
इसमें तुम प्रसन्न हो? सम्पूर्णं चेतनता से मधुबन ने कहा—हाँ? और तुम तितली? मैं भी। उसका नारीत्व अपने पूर्ण अभिमान में था।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
मैं तो अपने धर्म और संस्कृति से भीतर-ही-भीतर निराश हूँ। मैं सोचता हूँ कि मेरा सामाजिक बन्धन इतना विश्रृंखल है कि उसमें मनुष्य केवल ढोंगी बन सकता है। दरिद्र किसानों से अधिक-सें-अधिक रस चूसकर एक धनी थोड़ा-सा दान—कहीं-कहीं दया और कभी-कभी छोटा-मोटा उपकार—करके, सहज ही में आप-जैसे निरीह लोगों का विश्वासपात्र बन सकता है। सुना है कि आप धर्म में प्राणिमात्र की समता देखते हैं, किन्तु वास्तव में कितनी विषमता है। सब लोग जीवन में अभाव-ही-अभाव देख पाते। प्रेम का अभाव, स्नेह का अभाव, धन का अभाव शरीर-रक्षा की साधारण आवश्यकताओं का अभाव, दुःख और पीड़ा—यही तो चारों ओर दिखाई पड़ता है। जिसको हम धर्म या सदाचार कहते हैं, वह भी शान्ति नहीं देता। सबमें बनावट, सबमें छल-प्रपंच! मैं कहता हूँ कि आप लोग इतने दुखी हैं कि थोड़ी-सी सहानुभूति मिलते ही कृतज्ञता नाम की दासता करने लग जाते हैं। इससे तो अच्छी है पश्चिम की आर्थिक या भौतिक समता, जिसमें ईश्वर के न रहने पर भी मनुष्य की सब तरह की सुविधाओं की योजना है।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
खींचने से अच्छा होता
जयशंकर प्रसाद (चन्द्रगुप्त)
Diplomats Jayant Prasad and S. Jaishankar, both of whom had intimate knowledge of the nuclear deal, helped me prepare a booklet, ‘Facts about India’s Initiative for Seeking International Cooperation in Civil Nuclear Energy’, that was then translated into all Indian languages and published by the Directorate of Advertising and Visual Publicity (DAVP) of the ministry of information and broadcasting.
Sanjaya Baru (The Accidental Prime Minister: The Making and Unmaking of Manmohan Singh)
The heaviest penalty for declining to rule is to be ruled by someone inferior’ – PLATO
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
कंगाल मनुष्य स्नेह के लिए क्यों भीख माँगता है? वह स्वयं नहीं करता, नहीं तो तृण-वीरुध तथा पशु-पक्षी भी तो स्नेह करने के लिए प्रस्तुत हैं।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
तुम्हारा व्यवसाय कितने ही सुखी घरों को उजाड़कर श्मशान बना देता है।” “महाराज, हम लोग तो कला के व्यवसायी हैं। यह अपराध कला का मूल्य लगाने वालों की कुरुचि और कुत्सित इच्छा का है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
कुलवधू होने में जो महत्त्व है, वह सेवा का है, न कि विलास का।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
उसमें विलास का अनन्त यौवन है, क्योंकि केवल स्त्री-पुरुष के शारीरिक बन्धन में वह पर्यवसित नहीं है, बाह्य साधनों के विकृत हो जाने तक ही, उसकी सीमा नहीं, गार्हस्थ्य जीवन उसके लिए प्रचुर उपकरण प्रस्तुत करता है, इसलिए वह प्रेय भी है और श्रेय भी है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मदिरा-मन्दिर के द्वार-सी खुली हुई आँखों में गुलाब की गरद उड़ रही थी। पलकों के छज्जे और बरौनियों की चिकों पर भी गुलाल की बहार थी। सरके हुए घूँघट से जितनी अलकें दिखलाई पड़तीं, वे सब रँगी थीं। भीतर से भी उस सरला को कोई रंगीन बनाने लगा था। न जाने क्यों, क्या इस छोटी अवस्था में ही वह चेतना से ओत-प्रोत थी। ऐसा मालूम होता था कि स्पर्श का मनोविकारमय अनुभव उसे सचेष्ट बनाए रहता, तब भी उसकी आँखें धोखा खाने ही पर ऊपर उठतीं। पुरवा रखने ही भर में उसने अपने कपड़ों को दो-तीन बार ठीक किया, फिर पूछा—और कुछ चाहिए?
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
नींबू के फूल और आमों की मंजरियों की सुगन्ध
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
ऐश्वर्य का मदिरा-विलास किसे स्थिर रहने देता है!
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मूर्खता सरलता का सत्यरूप है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मूर्खता सरलता का सत्यरूप है। मुझे वह अरुचिकर नहीं। मैं उस निर्मल-हृदय की देख-रेख कर सकूं, तो यह मेरे मनोरंजन का ही विषय होगा।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
तासो चुप है रहिये’ गूँगा गुड़ का स्वाद कैसे बतावेगा, नमक की पुतली जब लवण-सिन्धु में गिर गई, फिर वह अलग होकर क्या अपनी सत्ता बतावेगी! ब्रह्मा के लिए भी वैसे ही ‘इदमित्यं’ कहना असम्भव है, इसीलिए महात्मा ने कहा है—‘तासो चुप है रहिये’।
जयशंकर प्रसाद (कंकाल)
धनकुबेर की क्रीत दासी नहीं हूँ। मेरे गृहिणीत्व का अधिकार केवल मेरा पदस्खलन ही छीन सकता है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
ऐश्वर्य का यांत्रिक शासन जीवन को नीरस बनाने लगा। उसके मन की अतृप्ति, विद्रोह करने के लिए
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
यन्त्र से बनी हुई रत्न-जटित नर्तकी नाच उठी। उसके नूपुर की झंकार उस दरिद्र भवन में गूँजने लगी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कराहट के साथ सिहर उठते;
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
रहस्य मानव-हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार, नियमों से यदि मानव-हृदय बाध्य होता, तो आज मगध के राजकुमार का हृदय किसी राजकुमारी की ओर न खिंचकर एक कृषक-बालिका का अपमान करने न आता।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
संसार भी बड़ा प्रपंचमय यन्त्र है। वह अपनी मनोहरता पर आप ही मुग्ध रहता है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अँधेर है जलदस्यु! तुम्हें प्यार करती हूँ।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
उसे तो मजूरी करके जीने में सुख
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मित्र मान लेने पर मनुष्य उससे शिव के समान आत्म- त्याग, बोधिसत्व के सदृश सर्वस्व समर्पण की जो आशा करता है और उसकी शक्ति की सीमा को प्राय: अतिरंजित देखता है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
एक सफल कदम्ब है, जिसके ऊपर मालती की लता अपनी सैकड़ों उलझनों से, आनन्द की छाया और आलिंगन का स्नेह-सुरभि ढाल रही है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
पारिवारिक सुखों से लिपटा हुआ, प्रणय-कलह देखूँगा; मेरे दायित्व-विहीन जीवन का वह मनोविनोद होगा।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
लैला सुन्दरी थी, पर उसके भीतर भयानक राक्षस की आकृति थी या देवमूर्ति! यह बिना जाने मैंने क्या कह दिया!
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
एक नया पीपल अपने चिकने पत्तों की हरियाली में झूम रहा था। उसके नीचे शिला पर प्रज्ञासारथि बैठे थे। नाव को अटकाकर मैं उनके समीप पहुँचा। अस्त होनेवाले सूर्य-बिम्ब की रंगीली किरणें उनके प्रशान्त मुखमंडल पर पड़ रही थीं। दो-ढाई हजार वर्ष पहले का चित्र दिखाई पड़ा, जब भारत की पवित्रता हजारों कोस से लोगों को वासना-दमन करना सीखने के लिए आमन्त्रित करती थी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
एक नया पीपल अपने चिकने पत्तों की हरियाली में झूम रहा था। उसके नीचे शिला पर प्रज्ञासारथि बैठे थे। नाव को अटकाकर मैं उनके समीप पहुँचा। अस्त होनेवाले सूर्य-बिम्ब की रंगीली किरणें उनके प्रशान्त मुखमंडल पर पड़ रही थीं। दो-ढाई हजार वर्ष पहले का चित्र दिखाई पड़ा, जब भारत की पवित्रता हजारों कोस से लोगों को वासना-दमन करना सीखने के लिए आमन्त्रित करती थी। आज भी आध्यात्मिक रहस्यों के उस देश में उस महती साधना का आशीर्वाद बचा है। अब भी बोध-वृक्ष पनपते हैं! जीवन की जटिल आवश्यकता को त्याग कर जब काषाय पहने सन्ध्या के सूर्य के रंग में रंग मिलाते हुए ध्यान-स्तिमित-लोचन मूर्तियाँ अभी देखने में आती हैं,
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
एक नया पीपल अपने चिकने पत्तों की हरियाली में झूम रहा था। उसके नीचे शिला पर प्रज्ञासारथि बैठे थे। नाव को अटकाकर मैं उनके समीप पहुँचा। अस्त होनेवाले सूर्य-बिम्ब की रंगीली किरणें उनके प्रशान्त मुखमंडल पर पड़ रही थीं। दो-ढाई हजार वर्ष पहले का चित्र दिखाई पड़ा, जब भारत की पवित्रता हजारों कोस से लोगों को वासना-दमन करना सीखने के लिए आमन्त्रित करती थी। आज भी आध्यात्मिक रहस्यों के उस देश में उस महती साधना का आशीर्वाद बचा है। अब भी बोध-वृक्ष पनपते हैं! जीवन की जटिल आवश्यकता को त्याग कर जब काषाय पहने सन्ध्या के सूर्य के रंग में रंग मिलाते हुए ध्यान-स्तिमित-लोचन मूर्तियाँ अभी देखने में आती हैं, तब
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परीक्षा देनी चाहिए। विवाहित जीवन सुखदायक होगा?—मैंने पूछा। किसी कर्म को करने के पहले उसमें सुख की ही खोज करना क्या अत्यन्त आवश्यक है? सुख तो धर्माचरण से मिलता है अन्यथा संसार तो दुःखमय है ही! संसार के कर्मों को धार्मिकता के साथ करने में सुख की ही सम्भावना है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
भिक्षु! आश्चर्य से प्रज्ञासारथि ने कहा—मैं तो ब्रह्मचर्य में हूँ। विद्याभ्यास और धर्म का अनुशीलन कर रहा हूँ। यदि मैं चाहूँ तो प्रव्रज्या ले सकता हूँ, नहीं तो गृही बनाने में कोई धार्मिक आपत्ति नहीं।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
इसी पृथ्वी पर था। जहाँ लालसा क्रन्दन करती है, दुःखानुभूति हँसती है और नियति अपने मिट्टी के पुतलों के साथ अपना क्रूर मनोविनोद करती है; किन्तु आप तो बहुत ऊँचे किसी स्वर्गिक भावना में…
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
संयम का वज्र-गम्भीर नाद प्रकृति से नहीं सुनते हो? शारीरिक क्रम तो गौण है, मुख्य संयम तो मानसिक है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
वह मेरी ही गहराई थी, जिसकी मुझे थाह न लगी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मैं उपहार देता हूँ, बेचता नहीं। ये विलायती और कश्मीरी सामान मैंने चुनकर लिए हैं। इसमें मूल्य ही नहीं, हृदय भी लगा है। ये दाम पर नहीं बिकते।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
कल्पना के सुख से सुखी होकर सो रहता।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मेघ घिरे थे, फूही पड़ रही थी।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मनुष्य के सुख-दुःख का माप अपना ही साधन तो है। उसी के अनुपात से वह तुलना करता है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
वसन्त के आगमन से प्रकृति सिहर उठी। वनस्पतियों की रोमावली पुलकित थी। मैं पीपल के नीचे उदास बैठा हुआ ईषत् शीतल पवन से अपने शरीर में फुरहरी का अनुभव कर रहा था। आकाश की आलोक-माला चंदा की वीथियों में डुबकियाँ लगा रही थी। निस्तब्ध रात्रि का आगमन बड़ा गम्भीर था।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
दूर से एक संगीत की—नन्हीं-नन्हीं करुण वेदना की तान सुनाई पड़ रही थी। उस भाषा को मैं नहीं समझता था। मैंने समझा, यह भी कोई छलना होगी। फिर सहसा मैं विचारने लगा कि नियति भयानक वेग से चल रही है। आँधी की तरह उसमें असंख्य प्राणी
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
संगीत की ध्वनि समीप आ रही थी। वज्रनिघोष को भेदकर कोई कलेजे से गा रहा था। अँधकार में, साम्राज्य में तृण, लता, वृक्ष सचराचर कम्पित हो रहे थे।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
संगीत-ध्वनि पवन के हिंडोले पर झूल रही
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
दरिद्रता ने उसे मलिन कर रखा है, पर ईश्वरीय सुषमा उसके कोमल अंग पर अपना निवास किए हुए है।
जयशंकर प्रसाद (जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां)
मेरी सुविधाएँ मुझे मनुष्य बनाने में समर्थ हुई हैं कि नहीं, यह तो मैं नहीं कह सकता; किन्तु मेरी सम्मति में जीवन को सब तरह की सुविधा मिलनी चाहिए। यह मैं नहीं मानता कि मनुष्य अपने सन्तोष से ही सम्राट् हो जाता है और अभिलाषाओं से दरिद्र।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
जीवन लालसाओं से बना हुआ सुन्दर चित्र है। उसका रंग छीनकर उसे रेखा—चित्र बना देने से मुझे सन्तोष नहीं होगा। उसमें कहे जाने वाले पुण्य—पाप की सुवर्ण कालिमा, सुख-दुःख की आलोक-छाया और लज्जा-प्रसन्नता की लाली-हरियाली उद्‌भासित हो। और चाहिए उसके लिए विस्तृत भूमिका, जिसमें रेखाएँ उत्सुक्त होकर विकसित हों।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
मनुष्य को जान-बूझकर उपद्रव मोल न लेना चाहिए। विनय और कष्ट सहन करने का अभ्यास रखते हुए भी अपने को किसी से छोटा न समझना चाहिए, और बड़ा बनने का घमण्ड भी अच्छा नहीं होता।
जयशंकर प्रसाद (तितली)
In the Trump vision of the world, allies have disappointed America and competitors have cheated it. India is fortunate in being neither.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
A 2018 study estimated that the resources drained from India by the UK alone were as much as $ 45 trillion by current value.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
In fact, the ability of India, Japan and the US to work together in a trilateral framework has been one of the novel elements of the changing Asian political landscape.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
The ethos of the Indian Ocean is a consultative one and in the long run, it is the people-centric initiatives and projects that are likely to be more sustainable.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
If connectivity is not to acquire sharp strategic meaning, then there must be credible assurances that projects are not used to exert influence.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
the efficiency of others, instead of spurring competitiveness, has actually led to putting off further reforms.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
The key to a more settled Sino-Indian relationship is a greater acceptance by both countries of multipolarity and mutuality, building on a larger foundation of global rebalancing.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
As electoral outcomes have affirmed across continents, the trend line today points towards stronger cultural identities and more nationalist narratives.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
India’s multi-faith society is also an enormous contribution to global stability. In fact, that is what acts as a firewall preventing the spread of fundamentalism and radicalism from India’s West to its East.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
While it can be asserted with some confidence that a combination of economics, technology and demographics will draw India and the West closer, the real difference would be made by politics and values. For it to succeed in good measure, India and the West must fit into each other’s scheme of the world.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
Today, there is a new geopolitical challenge – the emergence of multipolarity.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
India’s world view is consultative, democratic and equitable, but must find clearer expression.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
China has advocated a new type of great power relations, a Belt and Road Initiative as well as a ‘community of shared future of humankind’.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
Kuche and Khotan in today’s Xinjiang were the hubs of a flow from India that reached the very centre of China then. Rulers of these kingdoms along the road had Sanskrit names that testified to their connection with India.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
It was reassuring for these nations to see how staunchly India stood by them during the corona pandemic.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
South Asia is clearly among the least integrated regions of the world and being located at the centre of the Indian Ocean, its dysfunctionality affects that larger space directly.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
The India Way, especially now, would be more of a shaper or decider rather than just be an abstainer
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
After all, Atmanirbhar Bharat does coexist with Vasudhaiva Kutumbakam (the world is a family).
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
By going the extra mile to provide medicines to more than 120 nations, two-thirds of them as grant, a clear message of internationalism was sent.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
Where maritime security and HADR situations are concerned, India has emerged as a key player, especially in the Indian Ocean.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
Mother India is in many ways the mother of us all’ – WILL DURANT
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)
Asia is being shaped largely by the outlook of the US, the power of China, the weight of Russia, the collectivism of ASEAN, the volatility of the Middle East and the rise of India.
S. Jaishankar (The India Way: Strategies for an Uncertain World)